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होरी की हार्दिक बधाई

Hori Ki Hardik Badhai
Hori Ki Hardik Badhai

होरी की हार्दिक बधाई


होरी फसल पकने पर जश्न मनाने का त्यौहार है। यह पुराने वर्ष की विदाई और नए वर्ष के आगमन का त्यौहार है। 

होरी का अर्थ होता है, पके फसल को भुन कर खाना। फसल पकने के जश्न में गीत गाए जाते हैं, और मिट्टी, राख, रंग, नए पकवान से लोग गीले-शिकवे भुला कर फिर से एक हो जाते हैं। 

"बुरा न मानो होली है"

"बुरा न मानो होली है", का विचार तब आया जब यह फसल पकने का यह पवित्र त्यौहार होरी से होली हो कर इसमें फूहड़ गाने आ गए। विशेषकर भोजपुरी फूहड़ गाने। किसी पर्व, त्योहार, जश्न में "बुरा न मानो" जैसे विचार कैसे आ सकते हैं? यह स्वतः विचारणीय विषय है। यह स्वस्त स्वीकारोक्ति है कि ऐसा कुछ होने लगा जिससे लोग बुरा मानने लगे। और तब यह कहा जाने लगा कि फूहड़पन, बदतमीजी, और कई बार अपमान को भी बुरा नहीं मनो, क्योंकि यह सब होली के नाम पर हो रहा है। जैसे यह सब किसी अधिकार के तहत किया जा रहा है। 

होलिका या किसी महिला को जलाने का प्रसंग

भारत बुद्ध, महावीर, नानक, कबीर, रैदास, तिरुवल्लुवर (Thiruvalluvar), आदि का देश है। यह हमारी नैसर्गिक पहचान है। ऐसे में यह कल्पना से परे है कि भारत में कोई त्योहार किसी महिला को जलाकर मनाया जाए। चाहे किसी महिला को जलाने की घटना प्रतीकात्मक ही क्यों न हो। 

पारंपरिक रूप से किसी होलिका को नहीं जलाया गया है, इसलिए वह होली नहीं है। जैसा कि कहा जाता है कि होलिका को जलाया गया, इसलिए उसे होलिका दहन कहते हैं, और इसलिए होली मनाया जाता है। यह तथ्यात्मक रूप से, और हमारी सांस्कृतिक पहचान से मेल नहीं खाता। 

यह होरी दहन है। अर्थात सामूहिक रूप से जलाया गया आग जिसमें नए फसल को लोग भूनकर सामूहिक रूप से खाते हैं। यह एक सामूहिक रूप से मनाया जाना वाला पर्व है। 

भारतीय परंपरा और दर्शन में आग में सबकुछ पवित्र हो जाता है, इसलिए पके फसल को भुनने के लिए सामूहिक रूप से जलाया गया आग और भी पवित्र है। 

साथ ही इसे वर्ष के अंत में जलाया जाता है।

अतः होरी का राख पवित्रता के साथ-साथ पुराने वर्ष से नए वर्ष में प्रवेश के निरंतरता को भी दर्शाता है। 

इसलिए होरी के जश्न की शुरुआत, होरी दहन, होरी खाने, उस सामूहिक पवित्र राख को एक दूसरे को सम्मान लगाने से होकर शुरू होता है। 

होरी में कहीं किसी के अपमान नहीं है, कोई जबरदस्ती नहीं है, सब तरफ सिर्फ नए फसल, नए वर्ष का उल्लास है। जिनसे रिश्ते बिगड़ गए हैं, उनसे पुनः मिलन है। जिनके घर में कोई अनहोनी या दुखद घटना हुई है, उसमें भी सामूहिकता है, सिर्फ उल्लास ही नहीं दुःख भी बांटे जाएंगे। अतः नैसर्गिक रूप से "बुरा न मानो होली है" का और किसी महिला को जलाने इसमें कोई स्थान ही नहीं है। भारत में यह जो विकार है, इसे दूर करने की जरूरत है। 

आप सबको होरी की हार्दिक बधाई।

अनिल कुमार
असिस्टेंट प्रोफेसर
पटना विमेंस कॉलेज 
02/03/2026 

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