आज जब हंगर स्ट्राइक के लिए टेंट लगाने की कोशिश हुई तो दिल्ली यूनिवर्सिटी के गेट नंबर 4 पर तैनाद सुरक्षा कर्मियों ने कहा कि प्रॉक्टर ऑफिस से परमिशन लेकर आओ। जब प्रॉक्टर ऑफिस गए तो वहां का स्टाफ कहता है, कि दिल्ली विश्वविद्यालय में टेंट लगने की अनुमति नहीं है। जब अतिथि शिक्षक संघ की राष्ट्रीय अध्यक्ष आरती रानी प्रजापति ने पूछा कि दिल्ली यूनिवर्सिटी के शिक्षक संगठन दो महीने कुलपति कार्यालय के सामने राजाई-गद्दे लेकर कैसे बैठ गए थे? तो उनके पास जवाब नहीं था। इतने में ही मोरिस नगर थाना से भी पुलिस आ गई और अतिथि शिक्षक संघ के पदाधिकारियों को डिटेन करके थाने ले गई। साथ ही आंदोलन के समर्थन में जो लोग भी आए थे उन अतिथि शिक्षकों को बालपूर्वक तितर-बितर कर दिया गया।
अतिथि शिक्षकों को थाने में ले जाकर पुलिस ने बताया कि वे उन्हें कोई भी आंदोलन या धारणा-प्रदर्शन नहीं करने देंगें, क्योंकि देश कोरोना की महामारी से जूझ रहा है। जब धरना-प्रदर्शन में आए अतिथि शिक्षक को बल पूर्वक तितर-बितर कर दिया गया तब अतिथि शिक्षक संघ के पदाधिकारियों को चेतावनी देकर थाने से छोड़ दिया गया। इस पर अतिथि शिक्षक संघ की राष्ट्रीय अध्यक्ष आरती रानी प्रजापति ने कहा कि वे दुबारा आएंगी...। उन्होंने जोर दिया कि दिल्ली यूनिवर्सिटी और सरकार पुलिस को आगे करके कब तक तक अपने जिम्मेदारी और जबाबदेही से बचती रहेगी? उन्हें जबाब देना ही होगा! यहाँ यह दृष्टव्य है कि अतिथि शिक्षक संघ ने अपने धरने-प्रदर्शन की सूचना लिखित-पत्र कुछ दिन पहले ही मोरिस नगर थाना को दे दिया था और कोरोना के नियमों का पालन करते हुए अपना कार्यक्रम कर रहा था। फिर भी उन्हें दिल्ली यूनिवर्सिटी और सरकार के इशारे पर पुलिस द्वारा बल पूर्वक ऐसा करने से रोका गया।
इस घटना पर डॉ कुमार गौरव कहतें हैं, कि प्रशासन और दिल्ली यूनिवर्सिटी शिक्षक संघ (DUTA) अलग-अलग नहीं है। उन्हें यह बर्दस्त नहीं होगा कि के सामने कोई संगठन आगे बढ़े। अगर आप उनकी (DUTA) के गतिविधि पर बारीक नजर रखेंगे तब सब समझ में आएगा। कोरोना नागरिकों के मौलिक अधिकार को कुचलने का नया हथियार बन गया है। यह तथ्य भी प्रासंगिक है कि इसी दिल्ली यूनिवर्सिटी में ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) के लोगों ने जनवरी, 2021 के दूसरे सप्ताह में कोरोना के ही समय धरना-प्रदर्शन किया था। ऑकटूबर-नवंबर 2020 में सम्पन्न बिहार विधान सभी चुनाव में लाखों की रैलियाँ होती रही हैं और पश्चिम बंगाल विधान सभा चुनाव के लिए भी रैलियां हो रही हैं।
अतिथि शिक्षक संघ ने यह भी आरोप लगाया कि उसने दूसरे कई संगठनों को भी अपने आंदोलन में शामिल होने के लिए निमंत्रण दिया था, जिसमें दिल्ली यूनिवर्सिटी के सभी शिक्षक संगठन और शिक्षक संघ शामिल हैं। लेकिन कोई भी नहीं आया। इससे इनका दोहरा चरित्र उजागर हो गया है। सामाजिक न्याय की बात करना सिर्फ इनकी जुबानी चाल है और वे इसे वास्तविक धरातल पर नहीं उतारना चाहते हैं। साथ ही दिल्ली विश्वविद्यालय सहित दिल्ली के सभी शिक्षक संगठनों के रवैये से अतिथि शिक्षक भी खुद डरा हुआ है। उन्हें डर है कि अगर वे मुखर होकर अपने हक में आवाज उठाते हैं तो उन्हें इसकी सजा मिल सकती है। उनकी कहीं भी स्थाई नियुक्ति नहीं होगी। उनका डर भी कोई काल्पनिक नहीं है, क्योंकि उन लोगों ने ऐसा होते देखा भी है। ऐसा हो भी रहा है। आज दिल्ली यूनिवर्सिटी का शिक्षक संगठन और शिक्षक संघ अपने ही शिक्षकों के शोषण के खिलाफ चुप है। आज वह शोषक के साथ खड़ा है।
यही कारण है कि ये लोग अपने ही शिक्षकों के खिलाफ हैं। यह आश्चर्य की बात है, इसे समझिए- सितंबर 2019 से SOL के अतिथि शिक्षक को वेतन नहीं मिला है। सितंबर 2019 के ही सत्र का NCWEB ने UGC के नियम को न मानते हुए अतिथि शिक्षकों का वेतन 500 रुपये प्रति कक्षा की कटौती की है। जनवरी 2020 से NCWEB ने अतिथि शिक्षकों को कोई वेतन नहीं दिया है। SOL ने असाइनमेंट को उत्तर पुस्तिका के तौर पर चैक करवाया लेकिन चेक करने की दर 25 रुपये प्रति पुस्तिका के बदले 10 रुपये के हिसाब से देने की बात कही, लेकिन वह भी नहीं दिया। सिर्फ NCWEB और SOL ही नहीं बल्कि दिल्ली यूनिवर्सिटी के रेगुलर कॉलेजों में पढ़ा रहे अतिथि शिक्षकों को भी कुछ कॉलेज में नवंबर 2020 से वेतन नहीं मिला है और दो दिन में जनवरी 2021 भी समाप्त हो जाएगा। संकट सिर्फ इतना ही नहीं है, बल्कि इससे व्यापक है। रेगुलर कॉलेज में अतिथि शिक्षक को मई 2020 से ही कोई सैलरी नहीं दी गई और 15 मई 2020 से 15 नवंबर 2020 तक की सैलरी मिलेगी भी नहीं। अर्थात NCWEB, SOL, और रेगुलर कॉलेज के अतिथि शिक्षक को साल में सिर्फ छः माह ही सैलरी मिलता है। जबकि कॉलेज उनसे कुछ न कुछ काम लेता रहता है। जैसे कॉपी चेक करना आदि। छुट्टी में यही काम बाकी शिक्षक भी करते हैं जिनको पूरा वेतन मिलता है।
अतिथि शिक्षक संघ (Guest Teachers' Association / GTA) की राष्ट्रीय अध्यक्ष आरती रानी प्रजापति का कहना है, कि इतना कुछ हो जाने के बाद भी अगर आपको लगता है कि आप दिल्ली विश्वविद्यालय में स्थाई नियुक्ति के लिए जाएंगे और यह व्यवस्था जो आपके पेट के लिए आपके साथ नहीं है, वो आपका चयन करवा देगी; या आप गेस्ट से एडहॉक हो जाएंगे तब आप भी समायोजन के कारण स्थाई हो जाएंगे तो यह मात्र कल्पना है। जो प्रशासन आज आपके लिए नहीं है जिसकी वजह से आप कहीं न कहीं संघर्ष कर रहे हैं वो आपको स्थाई में रखना चाहेगा? बिल्कुल नहीं। अतिथि शिक्षकों ने स्वयं अपनी नियति तय कर ली है कि उनके साथ अब क्या होगा। आप नहीं लड़ना चाहते हैं; आपकी मर्जी, लेकिन हम लड़ेंगे! देखते हैं आखिर कब तक आप अपनी आराम कुर्सी पर बैठ सकते हैं। वे आगे कहती हैं, स्थाई, तदर्थ, रेगुलर कॉलेज का अतिथि शिक्षक और सबसे अन्त में NCWEB और SOL का अतिथि शिक्षक एक भेद है, पदक्रम है। हमें सारी सेवाएं देनी है, सारे काम करने हैं लेकिन हमारे हक की बात नहीं करनी।
SOL और NCWEB के शिक्षकों के साथ भेद-भाव सिर्फ शिक्षकों के प्रति भेद-भाव नहीं है बल्कि बेहद कम और अनियमित वेतन के दूसरे सामाजिक पहलू भी हैं। NCWEB में सिर्फ लड़कियां पढ़ती हैं। और इन लड़कियों की बाकी लड़कियों से एक अलग सामाजिक और आर्थिक पहचान हैं। यहाँ पढ़ने वाली लड़कियां वे होती हैं जिनका नामांकन रेगुलर कॉलेजों में नहीं हो पाता है या किसी कारण से नहीं ले पातीं। ऐसा इसलिए होता है कि स्नातक स्तर पर दिल्ली यूनिवर्सिटी में नामांकन बारहवीं के अंक के आधार पर होता है। 12वीं में ज्यादा अंक किसे आते हैं? या किसे आ सकतें हैं? 12वीं में उन लड़कियों के ज्यादा अंक आएंगे जिनके पास शिक्षा की अच्छी सुविधा रही हो। शिक्षा की अच्छी सुविधा होने क एक पहलू या शर्त है आर्थिक और दूसरा है सामाजिक अर्थात जातीय पहचान, और तीसरा पक्ष है जेंडर का पक्ष, क्योंकि लड़कियों को लड़कों की तुलना में घर के काम में हाथ बटाने की अपेक्षा और मजबूरी के करण शैक्षणिक कार्यों के लिए लड़कों की तुलना में कम समय मिल पाता है। साथ ही सामान्यतः लड़कियों के शिक्षा पर तुलनात्मक रूप से कम मौद्रिक और संसाधनात्मक खर्च किया जाता है। अर्थात NCWEB में पढ़ने वाली लड़कियां कम-से-कम तीन स्तर पर वंचित समुदाय से आती हैं। दूसरे शब्दों में NCWEB में पढ़ाने वाले शिक्षक त्रिस्तरीय वंचित वर्ग को पढ़ाते हैं। ऐसे में इन शिक्षकों की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। लेकिन सरकार संस्थानिक और संगठनात्मक तरीके से इन शिक्षकों को शोषित और वंचित रखती है, ताकि इन त्रिस्तरीय वंचित लड़कियों की शिक्षा जो पहले से ही प्रभावित है; आगे भी नकारात्मक रूप से प्रभावित होता रहे।
इससे सरकार की मंशा भी इन त्रिस्तरीय वंचित लड़कियों के प्रति जाहिर हो जाती है।
पहला सवाल तो यही है कि जब देश में साक्षरता दर और स्तर बढ़ रहें हैं तो रेगुलर कॉलेज की जगह लड़कियों के लिए NCWEB क्यों? रेगुलर कॉलेज क्यों नहीं? SOL भी क्यों रेगुलर कॉलेज क्यों नहीं? कोई कह सकता है कि NCWEB और SOL खोलने के पीछे मूल मकसद यह था कि इससे वे लोग भी शिक्षा ले पाएंगे जो रेगुलर शिक्षा से वंचित रह गए या नहीं ले सकतें हैं। लेकिन व्यवहार में वास्तविकता कुछ और ही है। सरकार आज के जरूरत के हिसाब से रेगुलर कॉलेज न खोलकर यह कह रही है कि आपके पास NCWEB, SOL (साथ ही अन्य पत्राचार यूनिवर्सिटी जैसे इंदिरा गांधी नैशनल ओपन यूनिवर्सिटी (IGNOU) आदि) का विकल्प है। यह स्टूडेंट्स सहित देश के साथ अन्याय है। हर कोई महंगे प्राइवेट कॉलेज में नहीं पढ़ सकता है।
NCWEB और SOL के शिक्षकों का शोषण उपर्युक्त वर्णित तथ्यों के बिना पूरी तरह से नहीं समझा जा सकता। यह एक बड़े शैक्षणिक षड्यंत्र का हिस्सा है। इस शैक्षणिक साजिश में दिल्ली यूनिवर्सिटी टीचर्स एसोसिएशन (DUTA) सहित दिल्ली विश्वविद्यालय के सभी शिक्षक संगठन भी जिम्मेदार हैं। इन लोगों ने दिल्ली यूनिवर्सिटी के तदर्थ (Ad Hoc) शिक्षकों को सुनहरे सपने के भ्रम में रख कर अपने साथ मिला लिया है। कहतें हैं उम्मीद पर तो दुनियाँ कायम है। लेकिन यहाँ तो झूठ-फरेब पर ही सन्नाटा पसरा है। तदर्थ (Ad Hoc) शिक्षकों को भरोसा है कि ये लोग उन्हें स्थायी कर देंगें, चाहे इसके लिए नैतिकता, कानून, और संविधान को रौंदना ही क्यों न पड़े।
प्रथम सप्ताह जनवरी 2021 से ही दिल्ली विश्वविद्यालय में होने वाले शैक्षणिक परिषद (adacemic council) और कार्य परिषद (executive council) के चुनाव प्रचार शुरू हैं। मैं पिछले 15 वर्षों से दे देख रहा हूँ कि इस बार भी शिक्षक समुदाय नौतिकता, कानून और संविधान को धत्ता बताते हुए तदर्थ (Ad Hoc) शिक्षकों से वादा कर रही है कि उन सभी को चाहे वो एक दिन ही पुराने क्यों न हो उनको स्थायी जरूर किया जाएगा। दिल्ली यूनिवर्सिटी टीचर्स एसोसिएशन (DUTA) सहित दिल्ली यूनिवर्सिटी के सभी शिक्षक संगठन शिक्षकों के स्थाई; पारदर्शी नियुक्ति का विरोध भी इसी आधार पर करते हैं। जिसके कारण दिल्ली यूनिवर्सिटी में शिक्षकों की नियुक्ति नहीं हो पाती है। इसका परिणाम यह हुआ कि आज दिल्ली यूनिवर्सिटी के कई कॉलेज में कई डिपार्ट्मन्ट में / विषय के एक भी स्थाई शिक्षक नहीं है। और पूरे दिल्ली यूनिवर्सिटी में आज 30 प्रतिशत से भी कम स्थायी शिक्षक हैं।
VIDEO: Educational System in the Reference of University of Delhi, Guest Faculty, Dr Dharmraj Kumar JNU (https://www.youtube.com/watch?v=Khcxm3-mwuE)
यह आंकड़ा महत्वपूर्ण है क्योंकि दिल्ली यूनिवर्सिटी टीचर्स एसोसिएशन (DUTA) सहित दिल्ली विश्वविद्यालय के सभी शिक्षक संगठन पूरे मनोयोग से सरकार के साथ शिक्षा, शिक्षण और यूनिवर्सिटी को बर्बाद करने पर तुले हुए हैं। यही स्थिति रही तो अगले 5 वर्षों में दिल्ली यूनिवर्सिटी में सिर्फ 10 प्रतिशत स्थायी शिक्षक रह जाएंगे। और इसके परिणाम आने भी लगे हैं। देश का प्रतिष्ठित दिल्ली विश्वविद्यालय आज देश के किसी भी टॉप 10 रैंक से बाहर हो चुका है। शिक्षकों की कमी, शिक्षकों का अपमान, शिक्षकों को गैर सम्मानजनक वेतन, शिक्षकों को समय पर वेतन न मिलना, यह सब संगठित संरचनात्मक स्तर पर किया जा रहा है। आज गेस्ट फैकल्टी के समस्या पर दिल्ली यूनिवर्सिटी टीचर्स एसोसिएशन (DUTA) सहित दिली यूनिवर्सिटी के सभी शिक्षक संगठन चुप हैं। लेकिन ये अपने कुछ स्वार्थपूर्ण माँग को लेकर तदर्थ (Ad Hoc) को अपने साथ रखता है। लेकिन जब 5 साल स्थायी शिक्षकों की संख्या 10 प्रतिशत रह जाएगी तब न कोई उनकी बात सुनेगा, न उनकी कोई प्रासंगिकता रह जाएगी और न उनमें कुछ बोलने की क्षमता बचेगी।
एक समय था जब दिल्ली यूनिवर्सिटी टीचर्स एसोसिएशन (DUTA) सहित दिल्ली यूनिवर्सिटी के सभी शिक्षक संगठन पूरे भारत ही नहीं पूरे विश्व में एक अद्भुत उदाहरण पेश करता था, लेकिन आज इनका प्रमुख काम अपने ही यूनिवर्सिटी और शिक्षा को बर्बाद करना है। आज DUTA के बहुत सारे माँग न सिर्फ गैरकानूनी और गैरसवैधानिक है बल्कि अनैतिक भी है जिसके कारण आज वह समाज में अपनी अहमियत और प्रभाव खो चुका है।
इन सभी विकट परिस्थियों में गेस्ट टीचर्स एसोसिएशन (Guest Teachers' Association / GTA) अपने संघर्षों से दिल्ली यूनिवर्सिटी टीचर्स एसोसिएशन (DUTA) सहित दिली यूनिवर्सिटी के सभी शिक्षक संगठन को एक नई राह दिखा रहा है।
Anil Kumar | Student of Life World
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